प्रसार शिक्षा का क्षेत्र | Prasar shiksha ka kshetra

 

Hello Friends इस लेख में हम प्रसार शिक्षा के क्षेत्र की विस्तृत चर्चा करेंगे जो बहुत सी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है। तो आइए देखते हैं कि प्रसार शिक्षा का क्षेत्र क्या है?  

प्रसार शिक्षा का क्षेत्र | Prasar shiksha ka kshetra

प्रसार शिक्षा का क्षेत्र

प्रसार शिक्षा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसका सीधा संबंध मानव जीवन तथा उससे जुड़ी हुई दैनिक समस्याओं से है। मुख्य रूप से उन समस्याओं का निदान इसके द्वारा होता है जो व्यक्ति के व्यवसाय से संबंधित हैं। प्रसार कार्य मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र के विकास तथा ग्रामीणों के स्तर को सुदृढ करने के लिए किया जाता है। प्रसार शिक्षा एक व्यावहारिक शिक्षा है जो ग्रामीणों को ग्रामीण परिवेश में रहकर ही दी जाती है। उनकी रूचि, आवश्यकता एवं इच्छा का ध्यान रखा जाता है, उनकी समस्याओं का समाधान किया जाता है। अतः प्रसार शिक्षा ‘प्रयोगशाला से खेत’ (Lab to Land) के सिद्धांत पर आधारित है। यह ग्रामीण लोगों के दिन-प्रतिदिन की समस्याओं का समाधान करना सिखाती है। अतः हम कह सकते हैं कि प्रसार शिक्षा का क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण परिवेश हैं। ग्रामीण व्यवसाय एवं कुटीर उद्योग, जैसे- कृषि, पशुपालन, मुर्गीपालन, दुग्ध उत्पादन, मिट्टी के बर्तन बनाना, कपड़े बुनना, बढ़ईगीरी, आदि को आधुनिक तथा नवीन तकनीकों एवं उपकरणों से जोड़कर रखना, प्रसार शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्र है। प्रसार शिक्षा का लक्ष्य गरीबी को दूर करना है। ग्रामीण जीवन मुख्य रूप से कृषि तथा कृषि पर आधारित उद्योग धंधों पर निर्भर है। अतः कृषि को उन्नत करना, उद्योग धंधों को विकसित करना, कुटीर उद्योग की स्थापना करना, प्रसार शिक्षा का मुख्य उद्देश्य है। (binitamaurya.com)

प्रसार कार्य या प्रसार शिक्षा के क्षेत्र को ठीक ढंग से समझने के लिए इसे तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है: 

(क) मनुष्य के निजी विकास का क्षेत्र, 

(ख) मनुष्य के परिवेश का विकास, 

(ग) मानव निर्मित संस्थाओं और साधनों का विकास एवं उन्नति।

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(क) मनुष्य के निजी विकास का क्षेत्र –

प्रसार शिक्षा का मूल उद्देश्य है ‘मनुष्य का निजी विकास करना’। मनुष्य के विकास एवं कल्याण के लिए व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास की जरूरत है। व्यक्तित्व विकास के सभी पहलुओं जैसे आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक विकास पर बल देना जरूरी है। वैयक्तिक विकास को सबसे अधिक प्रभावित करने वाला कारक होता है- अर्थ। मनुष्य का सुखी समृद्ध या संपन्न होना इसी पक्ष पर आधारित होता है। अर्थोपार्जन के लिए मनुष्य अपने रोजगार पर निर्भर रहता है। ग्रामीणों की आर्थिक समृद्धि का मुख्य साधन कृषि है। अतः ग्रामीणों के वैयक्तिक विकास के लिए यह आवश्यक है कि कृषि तथा उससे जुड़े हुए अन्य व्यवसायों एवं उद्योगों का विकास हो। आय के साधनों को बढ़ाने के लिए सहायक व्यवसायों की जानकारी ग्रामीणों को प्रदान किया जाए। मनुष्य के विकास से संबंधित उपरोक्त सभी बातें नई जानकारियों, नवीन पद्धतियों तथा नवीन तकनीकों पर आधारित है जो प्रसार शिक्षा के माध्यम से लोगों तक पहुंचती हैं। किसी व्यक्ति की प्रगति तब तक संभव नहीं है, जब तक वह साक्षर ना हो। वयस्क शिक्षा प्रसार कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण एवं अभिन्न अंग है। वैयक्तिक विकास के क्षेत्र में, प्रसार शिक्षा के अंतर्गत वयस्क शिक्षा कार्यक्रम अत्यंत ही प्रभावशाली,उपयोगी एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ख) मनुष्य के परिवेश का विकास

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने वातावरण या परिवेश से विभिन्न रूपों से जुड़ा रहता है। मनुष्य की कार्य शक्ति तथा उसकी निजी साधनों के समुचित उपयोग के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य जिस वातावरण या परिवेश में रहता है उसका विकास हो क्योंकि परिवेश व्यक्ति को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। सुविधा- संपन्न वातावरण मानव विकास की गति को तीव्र बनाते हैं। यातायात की सुविधा, शिक्षण व्यवस्था, संचार (communication) पेयजल, स्वच्छता, बैंक, डाकघर, पंचायत, अस्पताल, सामुदायिक केंद्र, बिजली आदि की व्यवस्था होना आवश्यक है। इसके अभाव में व्यक्ति या मनुष्य का विकास होना संभव नहीं है। प्रसार शिक्षा का क्षेत्र इस संदर्भ में आकर अत्यंत ही व्यापक एवं विस्तृत रूप ले लेता है। मनुष्य के जीवन को अनेक सामाजिक तत्व प्रभावित करते हैं, जैसे- परिवार, समाज, समुदाय आदि। समुन्नत परिवार, समुदाय और समाज से संबंध रखने वाला व्यक्ति प्रगति के रास्ते पर आसानी से बढ़ता है। परिवर्तनों एवं विकास के संदर्भ में सामूहिक प्रयास अधिक सुदृढ़ होते हैं अपेक्षाकृत वैयक्तिक प्रयास के, जिससे विकास की गति तीव्र होती है।(binitamaurya.com)

(ग) मानव-निर्मित संसाधनों तथा संस्थाओं का विकास एवं उन्नति –

प्रसार शिक्षा का क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत है। मानव-निर्मित संसाधनों तथा संस्थाओं का विकास एवं उन्नति करना प्रसार शिक्षा का कार्यक्षेत्र है। जब तक संसाधनों तथा संस्थाओं का विकास नहीं होगा तब तक कोई भी गाँव या शहर विकास की श्रेणी में नहीं आ सकता । बेहतर जीवन एवं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मनुष्य विभिन्न साधनों पर निर्भर करता है। हमारे आस-पास उपलब्ध साधनों का योजनाबद्ध, संगठित एवं नियंत्रित मूल्यांकन तथा उपयोग ही सफलता की कुंजी है। इन साधनों में समय, शक्ति, मुद्रा तथा अन्य भौतिक तत्व, अन्य व्यक्तियों द्वारा प्राप्त तथा निजी ज्ञान, रुचि, कार्यक्षमता, निपुणता , मनोवृत्ति आदि का समावेश होता है। कुछ सामुदायिक साधन जैसे विद्यालय, यातायात, बाजार, अस्पताल, स्वास्थ्य केन्द्र, डाकघर, बैंक, न्यायालय, पंचायत आदि भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। साधन चाहे मानवीय हों या अमानवीय, प्रत्यक्ष हो अथवा अप्रत्यक्ष, सामाजिक हो अथवा तकनीकी मनुष्य के विकास में उनका योगदान अपरिहार्य है। प्रसार शिक्षा के क्षेत्र के अंतर्गत वे सभी कार्यकलाप समाहित है जो ग्रामीण विकास से सम्बद्ध है। ग्रामीण विकास की कल्पना प्रसार शिक्षा के अभाव में नहीं की जा सकती है।

 

प्रसार शिक्षा के कार्यक्षेत्र को हम निम्न बिन्दुओं द्वारा समझ सकते हैं – 

 

(1) ग्रामीण विकास 

 

(2) नेतृत्व का विकास 

 

(3) सामुदायिक विकास 

 

(4) प्रौढ़ों एवं युवाओं का विकास 

 

(5) उचित गृह प्रबन्ध 

 

(6) संसाधनों का विकास 

 

(7) बेहतर एवं उन्नत कृषि प्रबन्ध एवं कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी 

 

(8) बाजार की व्यवस्था (कृषि उत्पादों को खरीदने एवं बेचने के लिए) 

 

(9) जीवन स्तर एवं रहन-सहन को उत्तम बनाना 

 

(10) कृषि आधारित उद्योग धन्धों का विकास करना 

 

(11) लघु एवं कुटीर उद्योगों का विकास

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